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जागियै गोपाल लाल, प्रगट भई अंसु-माल

जागियै गोपाल लाल, प्रगट भई अंसु-माल

Post By : Dastak Admin on 02-Sep-2018 18:27:35

सूरदास

 

कृष्‍ण, अर्जुन और ब्राहम्‍णजागियै गोपाल लाल, प्रगट भई अंसु-माल, मिट्यौ अंधकाल उठौ जननी-सुखदाई ।
मुकुलित भए कमल-जाल, कुमुद-बृंदबन बिहाल,मेटहु जंजाल, त्रिबिध ताप तन नसाई ॥ 
ठाढ़े सब सखा द्वार, कहत नंद के कुमार , टेरत हैं बार-बार, आइयै कन्हाई
गैयनि भइ बड़ी बार, भरि-भरि पय थननि भार , बछरा-गन करैं पुकार, तुम बिनु जदुराई ॥
तातैं यह अटक परी, दुहन-काल सौंह करी,आवहु उठि क्यौं न हरी, बोलत बल भाई ।
मुख तैं पट झटकि डारि, चंद -बदन दियौ उघारि, जसुमति बलिहारि वारि, लोचन-सुखदाई ॥
धेनु दुहन चले धाइ, रोहिनी लई बुलाइ, दोहनि मोहि दै मँगाइ, तबहीं लै आई बछरा दियौ थन लगाइ, 
दुहत बैठि कै कन्हाइ, हँसत नंदराइ, तहाँ मातु दोउ आई ॥
दोहनि कहुँ दूध-धार, सिखवत नँद बार-बार,यह छबि नहिं वार-पार, नंद घर बधाई ।
हलधर तब कह्यौ सुनाइ, धेनु बन चलौ लिवाइ,मेवा लीन्हौ मँगाइ, बिबिध-रस मिठाई ॥
जेंवत बलराम-स्याम, संतन के सुखद धाम,धेनु काज नहिं बिराम, जसुदा जल ल्याई । 
स्याम-राम मुख पखारि, ग्वाल-बाल दिए हँकारि,जमुना -तट मन बिचारि, गाइनि हँकराई ॥
सृंग-बेनु-नाद करत, मुरली मधु अधर धरत,जननी-मन हरत, ग्वाल गावत सुघराई ।
बृंदाबन तुरत जाइ, धेनु चरति तृन अघाइ, स्याम हरष पाइ, निरखि सूरज बलि जाई ॥

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