खास खबरें latest hindi news उज्जैनः स्वास्थ्य सेवाओं के सुदृढ़ीकरण हेतु CMHO डॉ. अशोक कुमार पटेल का मैदानी निरीक्षण । latest hindi newsडॉ.भार्गव 'भारत प्रतिभा सम्मान'से नई दिल्ली में अलंकृत हुए latest hindi newsराष्ट्रपति पद के लिए वोटिंग शुरू:कमला के लिए भारत में हो रही पूजा, मस्क बोले- ट्रम्प हारे तो ये आखिरी चुनाव होगा latest hindi newsमैगुइरे पोर्टो में मैन यूनाइटेड को बचाकर टेन हैग की मदद करता है latest hindi newsउप मुख्यमंत्री श्री देवड़ा ने त्यागी पायलट और फॉलो वाहन सुविधा । latest hindi newsमुंबई: सलमान की शूटिंग साइट पर पहुंचा संदिग्ध, बोला- 'बिश्नोई को बोलूं क्या?', पुलिस ने दबोचा latest hindi newsसोने की कीमतों में गिरावट, चांदी की चमक पड़ी फीकी latest hindi newsमध्यप्रदेश उद्यमियों के साथ कदम से कदम मिलाकर चलने को तैयार है। latest hindi newsरघु राय को संगीतमय श्रद्धांजलि: संगीत, मौन और शब्द समर्थ से याद किया- सुभाष अरोड़ा latest hindi newsमहाभारत युद्ध में कैसी थी कौरव-पांडवों की ‘अक्षौहिणी सेना’, धार्मिक ग्रंथों में ऐसा है उल्लेख

क्या तमिलों का द्रविड़ राजनीति से मोहभंग होने लगा है?- अजय बोकिल

क्या तमिलों का द्रविड़ राजनीति से मोहभंग होने लगा है?- अजय बोकिल

Post By : Dastak Admin on 09-May-2026 15:24:20

ajay bokil,

दक्षिणी राज्य तमिलनाडु में इस चुनाव में धूमकेतु की तरह उभरे नेता और लोकप्रिय  ‍अभिनेता फिल्म अभिनेता  जोसेफ विजय चंद्रशेखर उर्फ थलपति विजय तथा उनकी पार्टी तमिलगा वेत्री कषघम (टीवीके) अंततः सरकार बनाने लायक समर्थन जुटाने का दावा करने में भले  सफल हो गई हो,  लेकिन द्रविड़ राजनीति की धुरी रहे इस राज्य में विजय और टीवीके का उदय  क्या इस राज्य में पारंपरिक द्रविड राजनीति के अस्ताचल की शुरूआत है? या विजय के रूप में यही राजनीति एक नया चेहरा अख्तियार करेगी? क्या तमिल मतदाता का द्रविड़ राजनीति के मूल तत्वों जैसे कि सनातन हिंदू विरोध, हिंदी विरोध, आर्य और संस्कृत‍ विरोध, ब्राह्मण विरोध, नास्तिक सेक्युलरवाद, तमिल भाषा, संस्कृति को लेकर अति संवदेनशीलता तथा जाति आधारित आरक्षण के प्रबल समर्थन के आग्रह से मोह भंग हो गया है अथवा विजय का उभार तमिल पहचान के हिंदुत्व की व्यापक छतरी में स्वीकार का नया और शुरूआती चरण है? क्या तमिलों की युवा पीढ़ी अब अपने राज्य और संस्कृति को व्यापक परिप्रेक्ष्य में देखने की आग्रही है? और क्या ऐसे में वहां भाजपा के पैर फैलाने की गुंजाइश बन सकती है? ये वो तमाम सवाल हैं, जो इस बार तमिलनाडु विधानसभा चुनाव नतीजों से उभर रहे हैं।

तमिलनाडु में द्रविड़ आंदोलन की शुरूआत बीसवीं सदी की शुरूआत में सामाजिक और राजनीतिक सुधार के आग्रह, ब्राह्मणों के वर्चस्व और हिंदी थोपे जाने के विरोध में हुई थी। इसने पिछड़ी और छोटी जातियों को एकजुट किया। परिणामस्वरूप 1967 के विधानसभा चुनाव में द्रविड़ मुन्नेत्र कषघम ( डीएमके ) नेता अन्ना दुराई के नेतृत्व में पहली बार डीएमके की सरकार बनी। अन्ना दुराई सर्वमान्य नेता थे, लेकिन दो साल बाद ही कैंसर से उनकी मौत हो गई। फिर के. करूणानिधि पार्टी के नए नेता बने। इसके बाद डीएमके में झगड़े शुरू हो गए। पार्टी के एक और नेता और लोकप्रिय अभिनेता एमजी. रामचंद्रन ने पार्टी के हिसाब-किताब में गड़बड़ी का आरोप लगाते हुए जवाब मांगा तो डीएमके नेतृत्व ने उन्हें पार्टी से निष्कासित कर दिया। 1972 में एमजी रामचंद्रन ( एमजीआर) ने अपनी नई पार्टी एआईएडीएमके (आल इंडिया अन्ना द्रविड़ मुन्नेत्र कषघम) बनाई। इस पार्टी की विचारधारा  भी वही थी, जो डीएमके की थी। लेकिन इस पार्टी का नेतृत्व उच्च जाति के द्रविडियनों के हाथ में था। एमजीआर खुद ऊंची जाति मलयाली नायर जाति से थे। जबकि उनकी ‍राजनीतिक शिष्या और बाद में मुख्यमंत्री बनी जयललिता ब्राह्मण थीं। जबकि डीएमके की अगुवाई मोटे तौर पर अोबीसी और दलित नेता करते रहे हैं। इस मायने में एआईएडीमके को डीएमके की तुलना में ‘साॅफ्ट द्रविड पाॅलिटिक्स’ करने वाली अथवा आस्तिक सेक्युलरवादी पार्टी माना जा सकता है। तमिलनाडु में बीते पचास सालों तक इन्हीं दो पार्टियों के बीच सत्ता की अदला- बदली होती रही है। उसका मुख्‍य कारण रेवड़ी वितरण और एंटी इनकम्बेंसी रहा है। तमिलनाडु की तीन पीढि़यां इसी माहौल में पली-बढ़ी हैं। लेकिन जेन जी के जमाने में अब पहली बार बेहतर रोजगार, जीवन शैली, बाकी देश और दुनिया से जुड़ने की आंकाक्षा और नई राजनीति की तलाश के आग्रह ने द्रविड राजनीति के घेरे को तोड़ा है। खुद विजय की पार्टी की कोई स्पष्ट विचारधारा नहीं है। ज्यादा से ज्यादा उसे सुशासन और बड़ी रेवडि़यां बांटने का वादा करने वाली पार्टी माना जा सकता है। हालांकि विजय द्रविड आंदोलन के मूल तत्वों से एकदम अलग तो नहीं जा सकते, लेकिन उसे ज्यादा समावेशी बनाने के आग्रह के साथ काम जरूर कर सकते हैं। उन्हें तो अभी अपना संगठन भी खड़ा करना है।

तो क्या तमिलनाडु में द्रविड आंदोलन का जोश अब उतार पर है? सीमित अर्थ में इसका जवाब ‘हां’ में हो सकता है। इसका बड़ा कारण तो यह है कि तमिलनाडु में सबसे ज्यादा निशाने पर रही और कुल आबादी का महज 2.5 फीसदी ब्राह्मण जाति राजनीतिक रूप से पूरी तरह हाशिए पर हैं। बहुत से ब्राह्मणों ने तो तमिलनाडु छोड़कर अन्यत्र अपने आशियाने बसा लिए हैं। ज्यादातर पार्टियां उन्हें ‍टिकट भी नहीं देतीं। दूसरे, राज्य की सत्ता अब मोटे तौर पर पिछड़ी जातियों के हाथ में आ गई है। तीसरे, तमिलनाडु में सरकारी नौकरियों में 69 प्रतिशत आरक्षण 1969 में ही लागू हो गया था। जिसकी वजह से जातियों को अवसर की समानता का लक्ष्य काफी हद तक पूरा हो चुका है। ऐसे में आज बड़े पैमाने पर सभी जातियों के युवा तीव्र जातीय विभेद और दलित सिंड्रोम से बाहर निकल कर खुद को राष्ट्रीय और वैश्विक परिप्रेक्ष्य में देखने लगे हैं। यही कारण है कि वहां मतदाताअों ने इस बार द्रविड राजनीति के विकल्प के रूप में थलपति विजय की पार्टी को चुना। हालांकि घोर जातिवादी तत्व विजय के उदय को पचा नहीं पा रहे हैं।

लेकिन इसका यह अर्थ कतई नहीं है कि तमिलनाडु अब द्रविड राजनीति से मुक्त हो गया है। इस चुनाव में द्रविड राजनीति के पुरोधा दोनो दलों का कुल वोट अभी भी 55.40 फीसदी है। भले ही वो दो पार्टियों में बंटा हो। अगर विजय की पार्टी को ‘सेकुलर’ मान लें तो उसे 34.92 प्रतिशत वोट मिला है, जो द्रविड राजनीति के समर्थकों की तुलना में काफी कम है। बावजूद इसके अगर कांग्रेस जैसी खुद को सेक्युलर कहने वाली पार्टियां द्रविडवादी डीएमके का पल्ला छोड़ टीवीके से जुड़ने की इच्‍छुक हैं तो इसके पीछे कारण यही है कि वो राज्य में तीसरी ताकत के रूप में अपने उभार की भी संभावनाएं देख रही है।  चर्चा तो यह भी है कि कांग्रेस चुनाव पूर्व ही टीवीके से गठबंधन करना चाहती थी, लेकिन पार्टी के अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने उसे रूकवा दिया।

उधर हिंदुत्व की राजनीति करने वाली और द्रविड राजनीति के बीच एआईएडीमके के साथ एनडीए गठबंधन में शामिल भाजपा भी विजय के उदय से मन ही मन खुश है। भाजपा ने भी चुनाव के पूर्व विजय की पार्टी से तालमेल की कोशिशें की थीं, लेकिन विजय ने ही साम्प्रदायिक ताकतों से मेल के कारण संभावित राजनीतिक नुकसान की आशंका  के चलते हाथ आगे नहीं बढ़ाया। बावजूद इसके प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने तमिलनाडु में भारी जीत के बाद विजय को बधाई देने के लिए खुद फोन किया। इसमें भी कई संकेत छिपे हैं। अब देखना यह है कि विजय‍ किसका समर्थन लेते हैं। छोटी सेक्युलर पार्टियों का या फिर किसी द्रविडवादी पार्टी का? तमिलनाडु में पूर्व में सत्तारूढ़ डीएमके ने तो खुलकर केन्द्र से टकराव का रास्ता अपनाया था। उसने सनातनी हिंदुत्व, हिंदी और भाजपा के खिलाफ खुली वैचारिक जंग छेड़ दी थी। जिसे चुनाव में तमिलनाडु की जनता ने ही खारिज कर दिया। मुख्‍यमंत्री के रूप में एम.के.स्टालिन का हार जाना इसका सबसे बड़ा प्रमाण है।

अब सवाल यह है ‍कि थलपति विजय और उनकी पार्टी टीवीके किस रास्ते पर चलेगी? थलपति ने चुनाव प्रचार के दौरान डीएमके को कुचल देने की कसम खाई थी, क्योंकि डीएमके ने उनकी पार्टी की भ्रूण हत्या करने की कोशिश की थी। इसका अर्थ है कि वो कट्टर द्रविडवाद से अलग लाइन पर चलेंगे। यही नहीं विजय को यह भी शक है कि उनकी हिंदू पत्नी द्वारा उनसे अलग होकर तलाक की अर्जी लगाने के पीछे भी डीएमके की ही चाल थी। विजय स्वयं कैथोलिक ईसाई हैं, लेकिन उनकी मां हिंदू हैं। उनकी मां ने धर्म नहीं बदला है और वो साईंबाबा की भक्त बताई जाती हैं। ऐसे में विजय खुद को दोनो धर्मों के प्रति सदभाव का रूख अपना सकते है। विजय की मूल जाति क्या है, इस बारे में कहा जाता है कि उनके पूर्वज तमिलनाडु के प्रभावशाली वेलल्लार समुदाय से थे, जो ऊंची जाति में ही गिनी जाती है।

यहां गौरतलब बात यह है कि आज तमिलनाडु में सभी प्रमुख पार्टियों का नेतृत्व अोबीसी नेताअों के हाथ में है, फिर चाहे वो डीएमके हो या एआईएडीएमके। जबकि कांग्रेस का नेतृत्व एक दलित नेता के. सेल्वापेरूथंगई कर रहे हैं। विजय राज्य के पहले ऐसे मुख्यमंत्री होंगे, जो ईसाई हैं और जो प्रकारांतर से ऊंची जाति से आते हैं। राज्य में उनकी व्यापक स्वीकार्यता को उदार धार्मिक व जा‍तीय दृष्टिकोण से भी देखा जाना चाहिए। विजय अगर राजनीति में समावेशी मध्‍यमार्ग चुनते हैं तो इससे कट्टर द्रविड राजनीति कमजोर पड़ सकती है। जिससे भविष्य में भाजपा और कुछ हद तक कांग्रेस के नए सिरे से उभार की जमीन तैयार हो सकती है। इसे कट्टर द्रविडवाद>नास्तिक सेकुलरवाद>आस्तिक सेकुलरवाद>हिंदुत्व के क्रमिक रूप में भी देखा जा सकता है।  हालांकि यह कोई तुरंत होने की संभावना नहीं है। क्योंकि तमाम कोशिशों के बाद भी भाजपा को तमिलनाडु में केवल 1 सीट मिली है। अलबत्ता पिछले विस चुनाव की तुलना में उसका वोट शेयर महज 0.35 फीसदी बढ़ा, लेकिन सीटें 4 से घटकर 1 रह गई।  
एक मायने में विजय द्रविड पार्टियों को ही फाॅलो करेंगे और वो है रेवड़ी कल्चर। बल्कि वो इस मामले में उनसे भी एक कदम  आगे जाते दिख रहे हैं,  जिसका सीधा असर राज्य के खजाने पर पड़ेगा। विजय के चुनावी वादों को पूरा करने के लिए राज्य को 1 लाख करोड़ रू. की जरूरत होगी। विजय इस पर कैसे ‘विजय’ पाते हैं, यह देखना होगा।

Tags: ajay bokil,

Post your comment
Name
Email
Comment
 

Comment

आपका ब्लॉग